द्रौपदी के चीर हरण के पीछे दुर्योधन का प्रतिशोध

द्रौपदी के चीर हरण के पीछे दुर्योधन का प्रतिशोध
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द्रौपदी का चीर हरण भारतीय सभ्यता का वह काला पन्ना है। जिसको आज भी लोग मार्मिक और दिल दहलाने वाला षड्यंत्र मानते हैं। द्रौपदी महाभारत की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि द्रोपदी नहीं होती तो महाभारत का युद्ध भी नहीं होता। द्रौपदी के वस्त्र हरण के पीछे दुर्योधन और शकुनि का षड्यंत्र था। जब धर्मराज युधिष्ठिर जोकि द्रोपति के पति थे उनके हिस्से में इंद्रप्रस्थ नगर आया, उन्होंने वहां पर अपना राजपाट बसाया।

जब युधिष्ठिर नहीं चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए एक महा यज्ञ करवाया, जिसमें आसपास के राजाओं के सहमति होना अति आवश्यक हुआ करती थी। उस महायज्ञ में दुर्योधन को भी बुलाया गया, परंतु वह महायज्ञ सफल नहीं हो पाया। दुर्योधन ने सभा को अपमानित करने की कोशिश की जिसके लिए, उन्हें युधिष्ठिर दंड देना चाहते थे, परंतु दुर्योधन युधिष्ठिर के भाई थे, इसलिए उन्हें कड़ा दंड नहीं देना चाहते थे,

फिर दंड देने के लिए द्रौपदी ने युधिष्ठिर को सलाह दी की, दुर्योधन और कर्ण को हथियार त्याग देना होगा। इस बात को दुर्योधन ने अपना अपमान माना और तभी से उसके दिमाग में द्रोपदी के लिए घृणा भर गई।जब राजा धृतराष्ट्र की सभा में दुर्योधन ने पांडवों को द्युतक्रीड़ा के लिए बुलाया तो उसमें पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर ने उस द्युतक्रीड़ा में भाग लिया। वह खेल केवल मनोरंजन के अनुसार हो रहा था परंतु दुर्योधन और शकुनि के षड्यंत्र में युधिष्ठिर फस गए।

उन्होंने धीरे धीरे द्युतक्रीड़ा में अपने भाइयों को दांव पर लगाना चालू कर दिए और वह अपने चारों भाई हार गए। अब वह दुर्योधन के दास बन गए थे। आखरी में दुर्योधन को अपने अपमान का बदला लेने के लिए युधिष्ठिर को द्रोपदी को खेल में लगाने के लिए उकसाना था। युधिष्ठिर उस खेल में द्रोपदी को भी हार गए। उस सभा में राजा धृतराष्ट्र के साथ भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कुलगुरु कृपाचार्य और विधुर जैसे विद्वान भी बैठे हुए थे और वह सब इस खेल में हो रहे अन्याय को देख रहे थे।

दुर्योधन ने अपने छोटे भाई को दुशासन को द्रौपदी के बाल खींचते हुए लाने को कहा क्योंकि द्रौपदी अब दुर्योधन की दासी बन गई थी। दुशासन ने द्रौपदी के कक्ष में जाकर उसे खींचते हुए लाया और यह सब देख कर पांडवों को बहुत गुस्सा आया परंतु सभा में उपस्थित सभी लोग मौन रहे, खेल के नियमों के अनुसार केवल दुर्योधन को ही इस दुष्कर्म को रोकने का अधिकार था। दुशासन ने द्रौपदी का वस्त्रहरण करना चालू कर दिया। इसी समय द्रौपदी ने भगवान कृष्ण को याद किया और उन्होंने द्रौपदी की रक्षा की। इस तरह से दुर्योधन ने अपना प्रतिशोध पूरा किया।

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